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श्री यंत्र: अर्थ, बनावट, स्थापना विधि, मंत्र और रोज़ की पूजा

lalkitabgyan.com डेस्क·31 अक्टूबर 2026·5 मिनट

श्री यंत्र को धन, सुख और शांति का यंत्र माना गया है। जानिए इसकी बनावट का अर्थ, कौन सा श्री यंत्र लें, स्थापना की सही विधि, रोज़ की सरल पूजा, मंत्र और वे गलतियाँ जिनसे यंत्र बस सजावट बनकर रह जाता है।

इस लेख में
  1. यंत्र क्या होता है
  2. श्री यंत्र की बनावट का अर्थ
  3. कौन सा श्री यंत्र लें
  4. स्थापना का शुभ समय
  5. श्री यंत्र स्थापना की विधि
  6. श्री यंत्र का मंत्र
  7. रोज़ की सरल पूजा
  8. वे गलतियाँ जिनसे यंत्र बस सजावट बन जाता है
  9. अंत में

बहुत से घरों में श्री यंत्र होता है। किसी ने तोहफे में दिया, किसी ने मेले से खरीदा, तो किसी ने दिवाली पर ले लिया। पर ज़्यादातर घरों में वह किसी अलमारी के कोने में या दीवार पर सजावट की तरह पड़ा रहता है। फिर मन में सवाल आता है कि इतना बड़ा यंत्र घर में है, फिर भी पैसा क्यों नहीं टिकता, घर में खिंचाव क्यों बना रहता है।

असल बात यह है कि यंत्र रख देना और यंत्र को स्थापित करना, दो अलग बातें हैं। परंपरा में यंत्र को देवता का निवास माना गया है, और निवास तभी जागता है जब उसकी सही स्थापना और नियमित पूजा हो।

यंत्र क्या होता है

यंत्र किसी देवता या शक्ति का ज्यामितीय रूप है। जैसे मंत्र ध्वनि है, वैसे ही यंत्र आकार है। मंत्र को जपा जाता है, यंत्र पर ध्यान लगाया जाता है। दोनों मिलकर साधना को पूरा करते हैं।

सब यंत्रों में श्री यंत्र को सबसे ऊँचा स्थान मिला है। इसे देवी त्रिपुर सुंदरी और महालक्ष्मी का यंत्र माना जाता है, इसलिए इसे यंत्रराज भी कहते हैं।

श्री यंत्र की बनावट का अर्थ

श्री यंत्र की हर रेखा का अपना अर्थ है:

  • बिंदु: बिल्कुल बीच का बिंदु, जिसे सृष्टि का केंद्र और देवी का निवास माना गया है
  • नौ त्रिकोण: चार ऊपर की ओर नोक वाले (शिव) और पाँच नीचे की ओर नोक वाले (शक्ति)। ये आपस में गुँथकर कुल 43 छोटे त्रिकोण बनाते हैं
  • दो कमल: आठ पंखुड़ियों वाला और सोलह पंखुड़ियों वाला कमल
  • भूपुर: बाहर की चौकोर सीमा, जिसमें चारों दिशाओं में चार द्वार होते हैं

यह बनावट दिखाती है कि शिव और शक्ति, यानी चेतना और ऊर्जा, मिलकर ही सृष्टि चलाते हैं।

कौन सा श्री यंत्र लें

प्रकार खास बात
ताँबे का (समतल) सबसे प्रचलित, पूजा घर के लिए अच्छा
भोजपत्र पर बना पारंपरिक, पर नाज़ुक, संभालकर रखना पड़ता है
स्फटिक का पारदर्शी पत्थर का, ध्यान और शांति के लिए पसंद किया जाता है
मेरु श्री यंत्र उभरा हुआ, पिरामिड जैसा त्रि-आयामी रूप

यंत्र लेते समय देखें कि रेखाएँ साफ, बराबर और सही अनुपात में हों। टेढ़ी, टूटी या धुंधली रेखाओं वाला यंत्र न लें।

स्थापना का शुभ समय

श्री यंत्र की स्थापना के लिए शुक्रवार सबसे अच्छा माना जाता है, क्योंकि यह लक्ष्मी का दिन है। दिवाली, अक्षय तृतीया, धनतेरस और पूर्णिमा भी शुभ मानी जाती हैं। स्थापना सुबह के समय करें।

श्री यंत्र स्थापना की विधि

  1. शुद्धि: सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें। पूजा की जगह साफ करें।
  2. यंत्र को स्नान: यंत्र को पहले साफ पानी से, फिर कच्चे दूध या पंचामृत से, और आखिर में गंगाजल या साफ पानी से धोएँ। फिर साफ कपड़े से पोंछें।
  3. आसन: पूजा की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएँ और यंत्र को उस पर रखें।
  4. दिशा: यंत्र को घर के पूजा स्थान में, उत्तर-पूर्व दिशा में रखें। यंत्र की नोक वाला बिंदु ऊपर की ओर रहे।
  5. पूजन: घी का दीया जलाएँ, कुमकुम, अक्षत, लाल फूल और मिठाई चढ़ाएँ।
  6. मंत्र: कमल या स्फटिक की माला से नीचे दिए मंत्र की कम से कम एक माला जपें।
  7. प्रार्थना: अंत में हाथ जोड़कर घर में सुख, शांति और समृद्धि की प्रार्थना करें।

श्री यंत्र का मंत्र

श्री यंत्र की पूजा में महालक्ष्मी का यह मंत्र प्रचलित है:

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः

सरल रूप में केवल ॐ श्रीं नमः का जाप भी किया जा सकता है। बीज मंत्रों के बारे में विस्तार से बीज मंत्र लिस्ट में पढ़ें।

रोज़ की सरल पूजा

स्थापना के बाद रोज़ बहुत कुछ करने की ज़रूरत नहीं:

  • सुबह यंत्र के आगे दीया जलाएँ
  • कुछ पल यंत्र के बीच वाले बिंदु पर ध्यान लगाएँ
  • एक माला मंत्र जपें, समय कम हो तो 11 बार भी काफी है
  • शुक्रवार को खास तौर पर कुमकुम और फूल चढ़ाएँ

वे गलतियाँ जिनसे यंत्र बस सजावट बन जाता है

  • यंत्र को ज़मीन पर, बाथरूम की दीवार के पास या बेडरूम में रख देना
  • स्थापना के बाद महीनों तक उसे छूना तक नहीं
  • टूटा, मुड़ा या घिसा हुआ यंत्र रखे रहना
  • एक ही जगह पर कई यंत्र भीड़ की तरह रख देना
  • यंत्र पर धूल जमने देना

यंत्र खराब या टूट जाए, तो उसे सम्मान के साथ बहते पानी में प्रवाहित करें या किसी मंदिर में रख दें, और नया यंत्र स्थापित करें।

अंत में

श्री यंत्र कोई जादू की चीज़ नहीं, बल्कि ध्यान और श्रद्धा का एक केंद्र है। जब घर में उसकी सही स्थापना हो, और रोज़ थोड़ी देर उसके आगे बैठकर मन शांत किया जाए, तो वही यंत्र घर की ऊर्जा का केंद्र बन जाता है। धन से जुड़ी रुकावट किसी ग्रह के कारण हो, तो राहु के उपाय और पितृ दोष के उपाय भी ज़रूर देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

श्री यंत्र किस दिन स्थापित करें?

शुक्रवार सबसे अच्छा माना जाता है। दिवाली, धनतेरस, अक्षय तृतीया और पूर्णिमा भी शुभ मानी जाती हैं। स्थापना सुबह के समय करें।

श्री यंत्र किस दिशा में रखना चाहिए?

श्री यंत्र को पूजा स्थान में उत्तर-पूर्व दिशा में रखना अच्छा माना जाता है, और यंत्र की नोक ऊपर की ओर रहनी चाहिए।

श्री यंत्र का मंत्र क्या है?

प्रचलित मंत्र है: ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः। सरल रूप में ॐ श्रीं नमः का जाप भी कर सकते हैं।

कौन सा श्री यंत्र सबसे अच्छा है?

पूजा घर के लिए ताँबे का श्री यंत्र सबसे प्रचलित है। ध्यान के लिए स्फटिक का और विशेष पूजा के लिए मेरु श्री यंत्र पसंद किया जाता है। सबसे ज़रूरी है कि रेखाएँ साफ और सही अनुपात में हों।

श्री यंत्र में कितने त्रिकोण होते हैं?

श्री यंत्र में नौ बड़े त्रिकोण होते हैं, चार ऊपर की ओर और पाँच नीचे की ओर। ये आपस में गुँथकर कुल 43 छोटे त्रिकोण बनाते हैं।

टूटे हुए श्री यंत्र का क्या करें?

टूटे या खराब यंत्र को सम्मान के साथ बहते पानी में प्रवाहित करें या किसी मंदिर में रख दें, और नया यंत्र स्थापित करें।